कालसर्प योग शान्ति पूजा अनुष्ठान
ज्योतिष शास्त्र के अनेक योगों में से एक योग है 'कालसर्प योग'। राहु-केतु के एक तरफ सभी ग्रहों के होने से बनता है। यदपि अनेक काल सर्प योग वाले जातकों ने अपना विशिष्ठ स्थान बनाया है व वरदान स्वरूप साबित किया है, फिर नाम ही ऐसा है कि सुनते ही व्यक्ति भयभीत हो जाए। काल सर्प योग अनेक प्रकार के होते हैं, इनमें से मुख्य बारह प्रकार के होते हैं। प्राचीन ग्रन्थों में प्रत्यक्ष से तो इस योग का वर्णन नहीं मिलता लेकिन इसे नकारा भी नहीं जा सकता है क्योंकि महर्षि गर्ग, महर्षि पाराशर, महर्षि भृगु, वराह मिहिर आदि ज्योतिषाचार्यों ने कालसर्प योग को स्वीकार किया है। प्राचीन कालदर्शियों ने कालसर्प योग को विशेष महत्व दिया है। उन्होंने राहु-केतु को प्रशंसा नहीं की है। राहु-केतु यदपि छाया ग्रह है, इनका अपना कोई शरीर नहीं है, फिर भी ये इतने क्रूर ग्रह हैं कि इनसे निर्मित काल सर्प योग अधिक तर अशुभ फलदायक ही कहलाता है। किसी भी प्रकार का कालसर्प योग यदि राहु से प्रारम्भ होता है तो अकसर यह अत्यन्त हानि कारक होता है परन्तु यदि केतु से आरम्भ हो तो ज्यादा हानि कारक नहीं होता है। कालसर्प अधिक खराब होने से जातक को शारीरिक कष्ट के अलावा आजीवन संघर्ष, सम्बन्धियों द्वारा विरोध एवं संकटों से घिरा रहता है। कोर्ट कचहरी मुकदमे बाजी में भी अधिकांश समय व्यतीत होता है। कालसर्प योग का परिहार करावे, क्योंकि आयु, भाग्य, शरीर एवं मानसिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। तथा शुभ कार्यों में अर्चन आने की सम्भावना बन सकता है। विशेष जानकारी के लिए आप हमसे संपर्क कर सकते हैं।